जनेऊ(यज्ञोपवीत)

                 जनेऊ क्यों है आवश्यक


क्यों पहनते हैं जनेऊ और क्या है इसका लाभ, जानिए ?????

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भए कुमार जबहिं सब भ्राता। 

दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता ऊ

गुरुघाटां पढ़न रघुराई। 

अलप काल बिद्या सब आई ्या



भावार्थ: -ज्यों ही सब भाई कुमारावस्था के हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्री रघुनाथजी (ग्रामीणों सहित) गुरु के घर में विद्या पढ़ने गए और थोड़े ही समय में उन्हें सब विद्याओं ने ले लिया (


जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबंधध, बलबन्ध, मोनी प्रबंधध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। 'उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास है? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना।


जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ और स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। 

 

क्यों पहनते हैं जनेऊ👉 हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे 'यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीन काल में पहले शैले, संत और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। इस दीक्षा देने के तरीके में से एक जनेऊ धारण करना भी होता था। प्राचीनकाल में गुरुकुल में दीक्षा लेने या संन्यस्त होने के पूर्व यह संस्कार होता था।

 

यज्ञोपवीत को व्रतबंधध भी कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतीपन का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री और वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यंत आवश्यक है।

 

दीक्षा देनािक दीक्षित देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीन काल में पहले शैलों और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व। 

 

अन्य धर्मों में यह संस्कार का सनातन धर्म से प्रेरित यह उपनयन संस्कार सभी धर्मों में मिल जाएगा। यह दीक्षा देने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है, हालांकि कालांतर में दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्म परिवर्तन करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला लगा। इस आर्य संस्कार को सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश भिन्न-भिन्न रूप में अपनाया जाता रहा है। मक्का में काबा की परिक्रमा से पूर्व यह संस्कार किया जाता है।

 

सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। 


जैन धर्म में भी इस संस्कार को किया जाता है। वित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध पारसियों से भी है। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। बौद्ध धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। यहूदी और इस्लाम धर्म में खतना करके दीक्षा दी जाती है। 

 

जनेऊ को हर उस हिन्दू को धारण करना चाहिए जो मांस और मदिरा को छोड़कर सादगीपूर्ण जीवन यापन करना चाहता है। हम यहाँ जनेऊ पहन के आपको लाभ बता रहे हैं। जनेऊ के नियमों का पालन करके आप निरोगी जीवन जी सकते हैं।

 

जीवाणुओं-कीटाणुओं से बचाव: जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते हैं, अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।

 

शराब की सुरक्षापान यह नियम है कि बैठकर ही जलपान करना चाहिए अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। इसी नियम के तहत बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए। उक्त दोनों नियमों का पालन करने से किडनी पर प्रेशर नहीं पड़ता है। जनेऊ धारण करने से यह दोनों ही नियम अनिवार्य हो जाते हैं।

 

हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव👉 शोध के अनुसार मेडिकल साइंस ने भी यह पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी नियंत्रित करने में मददगार होता है। चिकित्सकों के अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।

 

लकवे से बचाव लक जनेऊ धारण करने वाला आदमी को लकवे मारने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दांतों पर दांत बैठा कर रहना चाहिए। मल मूत्र त्याग करते समय दांतों पर दांत बैठाकर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।

 

कब्ज से बचाव ने जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता है, जिनके संबंध में सहीों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की शिकायत नहीं होती है। पेट साफ होने पर शरीर और मन, दोनों ही सेहतमंद रहते हैं।

 

शुक्राणुओं की रक्षा👉 दाएं कान के पास से वेनें भी गुजरती हैं, जिनके संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों में होते हैं। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्धी होती है।

 

स्मरण शक्ति की रक्षा की कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्ति का क्षय नहीं होता है।] इससे मेमोरी कोष बढ़ता रहता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्टिव हो जाती हैं, जिनके संबंध में स्मरण शक्ति से है। दरअसल, गलतियां करने पर बच्चों के कान पकड़ने या ऐंठने के पीछे भी मूल कारण यही होता है।

 

आचरण की पवित्रता से मानसिक बल पर कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है।) पवित्रता का अहसास होने से आचरण शुद्ध होने लगते हैं। आचरण की शुद्धि से मानसिक बल बढ़ता है।

 

चमड़ी से रक्षा वालों ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसका कारण यह है कि जनेऊ धारण करने वाला स्वयं पवित्र आत्मरूप बन जाता है और इसमें स्वतः: केवल आत्मिक आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रभाव होता है।

 

कान में ही क्यों लपेटते हैं जनेऊ👉 मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटते हुए गिर पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनके संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उन्हें पूरा खोल देता है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है और कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय में कुछ होता है। द्रव्य विसर्जित होता है।


 जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट की बीमारी, मूत्र संबंधी रोग, रक्त, हृदय के रोग सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते हैं।

 

कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है। कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग और रक्त की समस्या से भी बचाव होता है। जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में स्पष्ट होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता।


 जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

 

👉 चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

 

👉 माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।

 

👉 विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।

 

जनेऊ पहने का धार्मिक और सामाजिक ओर धार्मिक महत्व

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जनेऊ का धार्मिक महत्व👉 यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है।

 

धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर आदि में जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं। इस्लाम धर्म में इसे वजू कहते हैं।

 

द्विज👉 स्वार्थ की संकीर्णता से निकलकर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं। शरीर जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है, जैसा अन्य जीवों का। आदर्शवादी जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा करना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है। इसी को द्विजत्व कहते हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म।

 

सामाजिक महत्व का आदमी को दो जनेऊ धारण किए जाता है। धारण करने के बाद उसे इंगित करता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् संबंधित पक्ष का।


एक-एक जनेऊ में 9-9 साल होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 योजनाओं का भार ये ऋण है उसे कंप्यूटिंग करना है। अब ये 9-9 हारून के अंदर से 1-1 टन निकालकर देखें तो इसमें 27-27 वर्ग होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण शोधन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर लेके तो 27 + 9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36 = 3 + 6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है।


अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9 + 2 = 11 होगा जो हमें बताता है कि हमारी जीवन अकेले अकेले लोगों के पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1 + 1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋणशोधन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।

 

यज्ञोपवीत धारण करने के नियम 

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👉 यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता था। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है।

 

👉 लड़की भी पहन सकती है जनेऊ: वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर रही है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह लिंगों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह शेरों में से तीन अवस्था स्वयं के और तीन पत्नी पत्नी के बतलाए गए हैं।


👉 कब पहने जनेऊ: जिस दिन गर्भ धारण किया जाए उसके अहवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद ज्यादातर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उन्हें विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।

 

।।यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजत ।।


अर्थात अशौच और मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही उतारें।

 

👉 किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करने के पूर्व जनेऊ धारण करना आवश्यक है।


👉 विवाह तब तक नहीं होता जब तक की जनेऊ धारण नहीं की जाती।


👉 जब भी मूत्र या शौच विसर्जन करते समय जनेऊ धारण किया जाता है।

 

र्जन यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ साफ करके ही उतारना चाहिए। इसकी स्थूल अभिव्यक्ति यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान समान बहाने बार-बार किया जाए।


या यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 महीने से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।


👉 जन्म-मरण के सूतक के बाद यह बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएँ भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किंतु उन्हें हर मासुत शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।


जाता यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता है। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतरना, तो प्रायोजन की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।


👉 देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए अलग व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाओ, केवल उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए। 

 

जनेऊ क्या हैने आपने देखा है कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बगल की ओर एक अनिश्चित धागा लपेटे रहते हैं। इस कथन को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन पोंसों वाला एक सूत्र होता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर और अयं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।


तीन सूत्र क्यों सूत्र जनेऊ में मुख्नयरूप से तीन सूत्र होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है। 

 

नौ तार नौ यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक प्रमुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छी बोले और खाटे, आँखें से अच्छे लेके और कानों से अच्छे सुने।

 

पाँच गांठठ यज्ञोपवीत में पाँच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पाँच यज्ञों, पाँचों ज्ञानियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक है।

 

जनेऊ की लंबाईने यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक सहित कुल 32 विद्याएँ होती हैं। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, साहित्य, कला, साहित्य, भाषा, उपकरण निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

 

जनेऊ धारण वस्त्रने जनेऊ धारण करते हुए बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन द्वारा उसके शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होता है। मेखला और कोपीन पहनी जाती है।

 

मेखला, कोपीन, दंड👉 मखला और कोपीन संयुक्त रूप से दी जाती है। कमर में बांधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को मेखला कहते हैं। मेखला को मुंज और करधनी भी कहते हैं। कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़ों से मेखला बनती है। कोपीन लगभग 4 इंच चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लंगोटी होती है। इसे मेखला के साथ टांक कर भी रखा जा सकता है। दंड के लिए लाठी या ब्रह्म दंड जैसा रोल भी रखा जा सकता है। यज्ञोपवीत को पीले रंग में रंगकर रखा जाता है।

 

जनेऊ धारण हाथ बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड सहित, कोपीन और पीले दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने पूरे परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्सित करके बनाया जाता है। तीन स्रोतों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल जाता है।

 

गायत्री मंत्र से यज्ञोपवीत गायत्री मंत्र से शुरू होता है। गायत्री- उपवीत का निष्कर्षन ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत में तीन तार हैं, गायत्री में तीन चरण हैं। 'तत्सवितुर्वरेण्यं' प्रथम चरण, 'भर्गोदेवस्य धीमहि' द्वितीय चरण, 'धियो योनि न: प्रचोदयात्' तृतीय चरण है। गायत्री महावंश की प्रतिमा- यज्ञोपवीत, जिसमें 9 शब्द, तीन चरण, सहित तीन व्याहृतियां समाहित हैं।

 

यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है

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यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेतिसहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।

 

ऐसे करते हैं संस्कार करते यज्ञोपवित संस्कार प्रारम्भ करने के पूर्व बालक का मुंडन करवाया जाता है। उपनयन संस्कार के मुहूर्त के दिन लड़के को स्नान करवाकर उसके सिर और शरीर पर चंदन केसर का लेप करते हैं और जनेऊ पहनाकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर होम करते हैं। 


फिर विधिपूर्वक गणेशादि भगवान का पूजन, यज्ञवेदी और लड़के को अधोवस्त्र के साथ माला पहनाकर बैठाया जाता है। फिर दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके भगवान के आहनावन के साथ उसे शास्त्र शिक्षा और व्रतों के पालन का वचन लिया है।

 

फिर उसकी उम्र के बच्चों के साथ बैठाकर चूरमा खिलाते हैं फिर स्नान कराकर उस वक्त गुरु, पिता या बड़े भाई गायत्री मंत्र सुनाकर कहते हैं कि आज से अब अब ब्राह्मण हुआ अर्थात ब्रह्म (सिर्फ ईश्वर को मानने वाला) माने वाला हुआ।

 

इसके बाद मृगचर्म ओढ़कर मुंज (मेखला) का कंदोरा बांधते हैं और एक दंड हाथ में देते हैं। तत्पश्चात वह बालक उपस्थित लोगों से भी मांग की है। शाम को खाना खाने के पश्चात-दंड दंड के साथ कंधे पर रखकर घर से भागता है और कहती है कि मैं पढ़ने के लिए काशी जाता हूं। बाद में कुछ लोग शादी का लालच देकर पकड़ लाते हैं। तत्पश्चात वह गाय ब्राह्मण मान लिया जाता है।


विद्यारम्भ (शिक्षा प्रारंभ) और यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने का मुहूर्त

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बालक को सर्वप्रथम विद्यालय में प्रवेश के लिए

द्वितीय तृतीय पञ्चमी छठी दसवीं एकादशी व द्वादशी

सोमवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार का दिन शुभ रहता है।


इसके अतिरिक्त

अश्विनी रोहनी मृगशिरा आर्द्रा पुनर्वसु चित्र हस्तियों अनुराधा व रेवती नक्षत्र भी शुभ होते है ।2,3,5,6,10,11 व 12 भी शुभ तिथि माने जाते है।


यज्ञोपवीत संस्कार का मुहूर्त

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उपनयन (यज्ञोपवित) संस्कार के बाद ही व्यक्ति को द्विज कहा जाता है।

यज्ञोपवीत के 3 चरणों क्रमशः पितृऋण, ऋषिऋण एव देवऋण कुल की मर्यादा के अंतर्गत होते हैं।


यज्ञोपवित धारण का समय

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 अधिकतम यज्ञोपवीत

     आयु का समय

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    16 वर्ष ब्राह्मण के लिए

                        5 वाँ या 8 वाँ वर्ष

    22 वर्ष क्षत्रियों के लिए

                        6 वाँ या 11 वाँ वर्ष

    24 वर्ष वैश्य के लिए

                        8 वाँ या 12 वाँ वर्ष


जब सूर्य मकर कुम्भ मीन मेष और मिथुन में होता है। अर्थात उत्तरायण में शामिल हरि शयन का समय छोड़ कर अर्थात आषाढ़ शुक्ल 11 से कार्तिक शुक्ल 11 तक का समय छोड़ कर यज्ञोपवीत के लिए शुभ समय माना जाता है।


सभी स्थिर नक्षत्र स्थिर उ • फा, उ • शाद, उ • भाद्रपद, रोहणी।


सभी मृदु नक्षत्र👉 मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा।


सभी लघु नक्षत्र लघु हस्त👉 अश्विनी👉 पुष्य व अभिजित।


सभी चर नक्षत्र चर स्वाति, पुनर्वसु, धनिष्ठा और शतभिषा

यह सभी शुभ नक्षत्र होते हैं।


येमे से पुनर्वसु ब्राह्मणों के लिए शुभ नहीं माना जाता है।

योग्य पक्ष की 2,3,5,10,12

कृष्ण पक्ष की 2,3,5 ठीक है।


अशुभ तिथि जो की तस्य्य है।

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आषाढ़ शुक्ल 10, जयंती शुक्ल 2, पौष शुक्ल 11, माघ शुक्ल 12 और संक्रांति का दिन है।


रिक्ता तिथि

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4,9,14


गलियों की तारीख

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13,14,15,30,1,4,7,8,9

इन तिथियो का त्याग करना चाहिए।

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   जय श्री राम

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