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जनेऊ(यज्ञोपवीत)

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                  जनेऊ क्यों है आवश्यक क्यों पहनते हैं जनेऊ और क्या है इसका लाभ, जानिए ????? 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ भए कुमार जबहिं सब भ्राता।  दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता ऊ गुरुघाटां पढ़न रघुराई।  अलप काल बिद्या सब आई ्या भावार्थ: -ज्यों ही सब भाई कुमारावस्था के हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्री रघुनाथजी (ग्रामीणों सहित) गुरु के घर में विद्या पढ़ने गए और थोड़े ही समय में उन्हें सब विद्याओं ने ले लिया ( जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबंधध, बलबन्ध, मोनी प्रबंधध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। 'उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास है? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ और स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म।    क्यों पहनते हैं जनेऊ👉 हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे 'यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जा...

छन्दों का परिचय

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                          छन्द एक  परिचय छन्द शब्द मूल रूप से छन्दस्   छन्दः है। इसका शाब्दिक अर्थ दो है - 'आच्छादित कर देने वाला' और 'आनन्द देने वाला'। लय और ताल से युक्त ध्वनि मनुष्य के दिल पर प्रभाव डाल कर उसे एक विषय में स्थिर कर देती है और मनुष्य उससे प्राप्त आनन्द में डूब जाता है। यही कारण है कि लय और समन्वय रचना छन्द कहलाती है। इसका दूसरा नाम वृत्त है। वृत्त का अर्थ संतुलित रचना है। सर्कल भी छन्द को इसलिए कहते हैं, क्यों कि अर्थ जाने बिना भी सुनने वाला इसके स्वर-लहरी से प्रभावित हो जाता है। यही कारण है कि सभी वेद छन्द-रचना में ही संसार में प्रकट हुए थे। के भेद छन्द मुख्य तो दो प्रकार के हैं: 1)   मात्रिक और 2) वार्णिक 1) मात्रिक छन्द: मात्रिक छन्दों में मात्राओं की गिनती की जाती है।     2) वार्णिक छन्दों में वर्णों की संख्या निश्चित होती है और ये लघु और दीर्घ का क्रम भी निश्चित होता है, जब कि मात्रिक छन्नों में इस क्रम का होना अनिवार्य नहीं है। मात्रा और वर्ण को कहते हैं, ये समझिए: मात...

श्री दुर्गा सप्तशती महात्म्य

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  ई-पेपर   होम   ›     पंचांग-पुराण   ›     श्री दुर्गा सप्तशती महात्म्यः अर्गला स्तोत्र से मिलती है विजय, दूर होते हैं कष्ट श्री दुर्गा सप्तशती महात्म्यः अर्गला स्तोत्र से मिलती है विजय, दूर होते हैं कष्ट सूर्यकांत द्विवेदी , मुरादाबाद Last Modified: Wed, Oct 10 2018. 22:41 PM IST     श्री दुर्गा सप्तशती में देवी कवच के बाद अर्गला स्तोत्र पढ़ने का विधान है। अर्गला कहते हैं अग्रणी या अगड़ी। सारी बाधाओं को दूर करने वाला। किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए आवश्यक है कि आप आगे बढ़कर अपना और दूसरों का मार्ग प्रशस्त करें। संसार में कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसका समाधान देवी न करती हों। बस, उनको सच्चे दिल से पुकारने की आवश्यकता है। अर्गला स्तोत्र के यूं तो समस्त मंत्र ही सिद्ध हैं। ये सभी मारण और वशीकरण मंत्र हैं। सभी मंत्रों में हम देवी भगवती से कामना करते हैं कि हमको रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो। मनुष्य जिन जिन कार्यों की अभिलाषा करता है, वे सभी कार्य अर्गला स्तोत्र के पाठ मात्र से पूरी हो जाती हैं। समस्त कार्यों में विजयश्री इस पाठ...